ये जो तुम्हारा “मैं” है न
हाँ, यही वाला
मैं, मुझे, मेरा, मुझसे
यही वाला
हाँ, हाँ
सिर्फ तुम्हारा नहीं
मेरा भी है
सभी का है ये तो
इतनी समानता तो शायद
दो जुड़वाँ बच्चों में भी नहीं होती
जितनी तेरे मेरे इस “मैं” में है
इस “मैं” का जो मत है न
बड़ा दृढ़ है
इतना बल ख़याल में नहीं
इतनी रफ़्तार किसी याद में नहीं
इतना जादू किसी माया में नहीं
ये “मैं” है
तुझसे और मुझसे अलग
पर छलता ऐसे है
जैसे अपना ही हो
जब तुम अपनी कार में बैठे
पीछे आती एक तेज़-तर्रार लाल कार को देखते हो
तब ये आता है
0-1 second में
“काश मेरे पास ये होती” से
“इतनी तेज़ कैसे?”
से
“आगे नहीं निकलने दूँगा” तक पहुँच जाता है
ये तब आता है
जब आपको पता है
कि आप गलत तो हैं
पर कोई और बता दे
जब restaurant के बाहर
आपसे पहले किसी और को जगह मिलती है
जब आप कहते हैं
“ये रास्ता लेते हैं”
और आपका सहयात्री कहता है
“नहीं, वो वाला”
जब आप
बेखयाली में
अपने साथी की गलतियों का हिसाब रखते हो
ये इतनी चालबाज़ी से आता है
कि आप इसे कभी “self respect”
तो कभी “personal space” समझने लगते हैं
कभी “शोषण”
तो कभी “अन्याय”
कभी “success”
तो कभी “beauty”
बड़ी मेहनत लगती है
बड़ा ज्ञान
बहुत आत्मचिंतन लगता है
उस “मैं” को दुत्कारने में
खुद से अलग करने में
असल शोषण
और असल सौंदर्य समझने में
हर रोज़
बार-बार लगता है
समर्पण करने में
खुद को, सबके लिए
“आ जाओ, जो लेना है ले जाओ”
कहने में
चलो
अभी से शुरू करते हैं
आ जाओ
जो लेना है ले जाओ
जीत ले जाओ
दौलत ले जाओ
हुस्न ले जाओ
आगे निकल जाओ
सब ले जाओ।
ये मैं भी ले जाओ
Really awesome
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