चंद सिक्के चंद सिक्कों को गिन गिन खनकते चमकते, आज मेरे कल शायद तेरे पुराने नए छोटे बड़े सब सिक्कों को फिर से गिन एक पुराने बटुए की उधड़ी जेब में संभाल कर, मैं हर सुबह घर से निकलता बाल संवार, चेहरा निखार थोड़ी शरारत से माँ को हंसा कर खिलखिलाहट घर में फैला कर... Continue Reading →
Protected: गयी रात
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“फिर कभी..”
"फिर कभी..", ज़िन्दगी ने कहा, "तुमसे, मैं फिर कभी मिलूंगी देखना तब तक गुज़र हो पाए बस, वादा नहीं है - वादा तुम समझ नहीं पाओगे, वादा मैं रख भी नहीं पाऊँगी, यूँ ही बस लड़ने का बहाना बनेगा - वादा सिर्फ कोशिश करेंगे - मैं वापस आने की.. तुम यहीं रहने की मुश्किल होगी..... Continue Reading →
मेरी २५ मुश्किलें
घर लौटते हुए आज गर्मी बहुत थी शाम के 7:30 बजे भी आग बरस रही थी मैंने कार का AC बढ़ा दिया और पसीने पोंछते हुए दुनिया कोसने लगी कितनी कारें, कितने कम पेड़, सलेटी आसमान, कोई तारा नहीं बिन चमक का चाँद, जैसे कोई गोला बनाके उसमे रंग भरना भूल गया हो क्यों रहते... Continue Reading →
आधा तेरा आधा मेरा
उसने पूछा फूल चाहिए? मैंने गुलाब मांग लिया उसने पूछा खुशबु? मैंने चन्दन को छू दिया उसने उगता सूरज दिखाया मैंने पर्दा कर दिया ढलता चाँद दिखाया मैंने आँखों को मूँद लिया उसने पूछा साथी चाहिए? मैंने अपना बोझ थमा दिया ख़ुशी चाहिए? मैंने कहा तुम रहने दो - नहीं दे पाओगे ज़िद्दी था बोला... Continue Reading →
काले का किरदार
हर काल में है काले का किरदार हर सुबह पर शाम का है अधिकार जुबां से जुबां तक चलती महाभारत में काले हाथी की हुंकार तक सांवल कृष्ण के आकार तक हारे हुए शवों पर स्याह काग की पुकार तक और फिर अनंत बद्र की बौछार से ठंडी हुई राख तक हर काल में है... Continue Reading →
जड़ सी जमी
आंसूं में व्यर्थ क्यों करूँ, जब हर जान पानी मांगती फिर बढ़ूंगी फिर फलूंगी जब तक मेरी जड़ है मैं नहीं मरूंगी वृक्ष नहीं वृक्षा कहते हैं मुझे कभी छाँव सुहावनी, कभी चिता की अग्नि बनी मैं जड़ सी जमी
पुरानी डायरी
मैं लिखने बैठती हूँ जब भी पुरानी एक डायरी है जो दिखती है सबसे ऊपर हर बार एक एक पन्ना पलट कर आखरी खाली वाले तक जाती हूँ हमेशा पुराने में से ही नए शब्द खोजती हूँ, यूँ होती है हर शाम बसर कुछ ऐसा लिखा था नाम तेरा पहले पन्ने पर, पीछे की जिल्द... Continue Reading →
मेरे पिता के हाथ
जीवन तराशते, प्रकाश तलाशते मेरा जीवन बनाते कल से बेहतर आज, आज से बेहतर कल मेरे पिता के हाथ कभी करुणा से आखों की नमी पोंछते कभी झूठी नाराज़गी जताके लगाम खींचते बेरोक प्रेरक शक्ति बन कुछ लिखते जाते कभी खर्चे का हिसाब, कभी कल के ख्वाब मेरे पिता के हाथ द्रढ़ थे हर कदम,... Continue Reading →
तुम्हारे हिस्से की मेरी कहानी
तुम देखना सपने नए मैं सहेजूँगी यादें पुरानी तुम उड़ के देखो उड़ान कहाँ तक मैं देखूंगी गहराई कितनी तुम समेटना भीतर सब कुछ मैं संभाल लुंगी बाहर की कहानी तुम बांचना सफर के पड़ाव मैं बताती रहूंगी राहें कमानी ज़िन्दगी थोड़ी तुम जीना बाकी मैं पी लुंगी थोड़ी तुम गुनगुनाना बाकी मैं गा लुंगी... Continue Reading →
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