तुम कहते हो प्यार क्या है मैं नहीं समझती
शायद नहीं समझती
तुम जो कहते हो सही ही कहते हो
बस तुम्हारे पीछे पीछे चलती हूँ
तुम हँसते हो तो हंसती हूँ
जब रोते हो तो रो देती हूँ
तुम्हारी परछाई जैसी
तुम तक पहुँचने की कोशिश करती
जैसे तैसे बस तुम्हारे दाएं बाएं इधर उधर मंडराती रहती
पर शायद प्यार मैं नहीं समझती
सही कहते हो
तुम जो कहते हो सही ही कहते हो
मैं प्यार नहीं समझती
बस तुम जब नहीं होते हो तब तुम्हारे तकिये पर सोती हूँ
तुम्हारे उठने के बाद कुछ देर तुम्हारे कम्बल में रहती हूँ
तुम्हारी महक ढूंढ़ती
तुम नहीं हो ऐसे ख्वाब भी मैं झेल नहीं सकती
पहला निवाला खाते हुए तुम्हारे हाव भाव से खाने का स्वाद भांप लेती हूँ
धनिया कम, आधे परांठे के बाद चाय
दही में चीनी, तिल के लड्डू, धीरे पका खाना, बारिशें, संगीत
अथाह प्रेम और करके भूल जाना – ये सब तुमसे सीखा है मैंने
पत्तों की खुशबू, बे-इन्तहा मोहब्बत, स्वच्छंदता, खुल कर हंसना और आसानी से रो देना
मेरे साथी नहीं हो सिर्फ तुम, थोड़े थोड़े मेरे माता, पिता, मेरे गुरु, कभी बड़े, कभी बच्चे जैसे, मेरे अध्यापक, मेरा आइना सब हो तुम
पूरे हो तुम, इसीलिए पूरी हूँ मैं भी
शायद स्वार्थ है ये मेरा
शायद स्वार्थ ही है की जहाँ तुम होते हो बस वहीँ अच्छा लगता है मुझे
स्वार्थ ही है की जो तुम्हें पसंद है मैंने उसे अपनी पसंद भी बना लिया
तुमने नहीं माँगा
मैंने ही बना लिया
स्वार्थ ही ठीक है
प्यार भी धीरे धीरे समझ आ जायेगा
नहीं भी आएगा तो कोई बात नहीं
स्वार्थ में बड़ा मज़ा है
और वैसे भी तुम जो कहते हो
उसे क्या नकारना
स्वार्थ ही तो है
जी चाहता है तुम मेरे पास रहो बस
महकते हुए, मुस्कुराते हुए, चेहेकते हुए
प्यारे से
It’s just mind blowing
Excellent
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सच्चे प्यार का बहुत ही सुंदर व भावपूर्ण लेखन 👌🏼👌🏼👏😊
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