कभी सोचा है वहाँ क्या है?
वहाँ उस मोड़ पर
वो जो एक पेड़ों में ढका मकान है
हाँ वहीं जहां कभी नज़र नहीं रुकी
कभी बस नहीं रुकी, कभी टैक्सी नहीं मिली
वहीं जहां से कभी कोई नहीं आता जाता दिखा
अंदर कोई तो होगा मगर
आज ठीक उसके सामने एक coffee shop में बैठी हूँ
किसी का इंतेज़ार कर रही हूँ और time pass करने को कुछ नहीं
आज इसपर नज़र रुकी
और ठहर गयी
मैं यहाँ से रोज़ गुजरती हूँ
पिछले 15-16 सालों में लगभग हर रोज़
हमेशा मगर किसी सोच में गुम
कभी कहीं पहुँचने की जल्दी
कभी खुद से ही बतलाती
इसमें कुछ बहुत ख़ास है
नीम और अशोक के पत्तों में छिपा एक ऊँचा सा gate है
जंग खाया लोहे का, लेकिन विशाल, भव्य।
ना जाने कितने मौसमों का साक्षी
ना जाने कितनी कहानियों का सूत्रधार
यहाँ इस दूरी से अंदर एक हल्के सलेटी रंग का मकान दिखता है
दूर है, एक खिड़की है, सफ़ेद पर्दे के साथ
कोई रहता तो ज़रूर है यहाँ
क्यूँकि सब साफ़ दिखता है, सब अनुरक्षित
पोषित पौधे, साफ़ पगडंडी पेड़ों में गुम होती
अंदर तक यही जाती होगी शायद
अंदर बच्चे अपनी गेंद से खेलते इसी के इर्द गिर्द दौड़ते होंगे
गिरे भी यहीं होंगे, संभले भी यहीं
इसी पगडंडी से होकर इन बच्चों की माँ ने इस घर को अपनाया होगा
इसी से होके इन सबके रास्ते बाहर तक जाते होंगे
छुट्टी, नानी का घर, चिड़िया घर, स्कूल और कॉलेज सब यहीं से शुरू होता होगा
वो जो खिड़की है वहाँ से छनकर धूप अंदर दादी की छड़ी छूती होगी
वहीं से वो अपने बच्चों को आते जाते, खेलते कूदते देखती होगी
वहीं से माली को कहती होगी “वो पेड़ देखो सूखने लगा है, वो देखी वो जंगली बेल आ गयी है, वहाँ घास घनी नहीं हुई और ना जाने क्या क्या हिदायतें देती होगी।
कितनी कहानियाँ, कितने ही ठहाके, कैसे कैसे सपने, अनगिनत मुस्कुराहटें घटी होंगी यहाँ। कुछ चोटें, कुछ अश्रु और कुछ घाव भी ज़रूर होंगे।
मेरे घर जैसे, तेरे घर जैसे
ये घर भी तो सपनों का घर होगा ना
किसी का तो होगा ना
इसी सोच में थी मैं जब किसी पे पाँव बाहर की ओर आते दिखे
कोल्हापुरी चप्पल, सफ़ेद चूरिदार में धीमे पर दृढ़ कदम थे
लम्बा सूती सादा कुर्ता और काले चश्मे से झांकती आखें कुछ ढूँढती हुई मुझसे मिली
जैसे कोई पुरानी बचपन की याद सी हो
मुझसे मिली और मुस्कुरायी, आँखों आँखों में हाँ कहा
हाँ, मेरे बचपन की याद सी ही थी ये
मेरी सबसे प्यारी दोस्त नंदिनी जैसी थी ये
एक पल को लगा ये तो मेरा ही घर है
यहाँ मैं भी तो रहती हूँ, क्यूँकि वो यहाँ रहती है
एक पल में मैं उठ खड़ी हुई, उसकी ओर दौड़ने को
और फिर रुक गयी
नंदिनी तो है ही नहीं.. इस घर में क्या, इस दुनिया में अब कहीं नहीं
ये नंदिनी नहीं थी, मेरी कल्पना थी बस
ना जाने मुस्कुरायी भी थी या वो भी बस मेरे ख़याल थे
ये मेरे मन का छल था
थोड़ा दर्द और ढेर सारा प्रेम कहीं से निचोड़ लाया था
चलो वो ना सही, उसके जैसी थी।
और मैं उठ खड़ी हुई.. नयी दोस्त बनाने
एक नए चेहरे को उसकी पुरानी याद से मिलाने

भावपूर्ण अभिव्यक्ति 👌🏼👌🏼
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Khoob
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It was good actually 👏👏👏👏
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