कुछ दरवाज़े अंदर की ओर खुलते हैं
उन्हें हाथ से अपनी तरफ खींचना पड़ता है
खुद हट के उन्हें रास्ता देना पड़ता है
आराम से निकलना पड़ता है नहीं तो गिरने का डर लगता है
ये बाहर की दुनिया के लिए अंदर आने का न्यौता हैं
पर अंदर वालों के लिए जैसे पिता की चौखट
ध्यान से, धीरे से, दबे पाओं पहले एक किवाड़ खोलो
फिर दूसरा, दीवार से टकराएं नहीं इसका ध्यान रखो
और बहार निकलने पर पीछे मुड़ के वापस अपनी ओर खींच के इन्हें बंद करो
ताकि अंदर सब सहेजा हुआ रहे
फिर एक वो होते है जो बाहर की ओर खुलते हैं
बेबाक, अल्हड़ बेपरवाह से
बस हल्का सा धकेलने पर अंदर बाहर सब एक हो जाता है
न कुछ तेरा न मेरा – सब सांझा
न कोई सीमा न उसका उलंघन, सब खुला, सब ज़ाहिर
आसान, बहती नदी जैसे
आजाओ – जहां ले जाना है ले जाओ
कुछ भोले सरल बचपन जैसे
आज जो हाथ में है बस वही है सच
बाकी सब समय की दूसरी करवट के पीछे
– कुछ ऐसे
मेरा दरवाज़ा कौनसा है ?
और तेरा?

Picture Courtesy – https://www.facebook.com/savvyguliaphotography
Bahut khoobsurat
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अतिसुन्दर कविता👏
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Very nice.
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