चंद सिक्के | Chand Sikke

चंद सिक्के

चंद सिक्कों को गिन गिन
खनकते चमकते, आज मेरे कल शायद तेरे
पुराने नए छोटे बड़े
सब सिक्कों को फिर से गिन

एक पुराने बटुए की उधड़ी जेब में
संभाल कर, मैं हर सुबह घर से निकलता
बाल संवार, चेहरा निखार
थोड़ी शरारत से माँ को हंसा कर
खिलखिलाहट घर में फैला कर
झाड़ू की धूल से खुद को बचा कर
अपनी कपड़े जूते संभाल कर मैं हर सुबह घर से निकलता

कभी एक दोस्त का फ़ोन आता “भाई मैं फिर फँस गया, तू आजा”
तो कभी बॉस को मेरी याद आती “आज एक मीटिंग है थोड़ा, जल्दी आजा”
कभी पापा का कुछ सामान कहीं पहुँचाना होता
कभी बिजली का बिल, तो कभी राशन की लिस्ट जेब में होती
दफ्तर का काम संभाल कर दोस्त को थोड़ा लाइन पे लगा
जिसको जो चाहिए वो दिला कर

मैं हर शाम एक बस स्टॉप पर रुकता
बहुत शोर, अपार भीड़ में मैं आँखें बंद करता
और जादू की तरह सब शांत हो जाता – सब खाली – हल्का हल्का
बंद आँखों में आसमान नीला दिखता था – सड़क के बीच झाड़ियों में हरियाली आ जाती थी
शोर में संगीत सुनता और एक जानी अनजानी सी महक आती
ये मेरे दिन के सबसे ख़ास चंद पल होते
बहुत उल्झनों से मैं, जैसे रिहा हो जाता
फिर मैं अपने आने वाले कल के सपने संजोता

एक एक कतरा चुन चुन – मैं धीरे धीरे बहुत ध्यान से कल से कुछ पल चुरा के आज जीता
एक एक कर ताना फिर बाना बिन बिन मैं सुकून की चादर सजाता
थोड़े आराम के सितारे धागे में पिरो पिरो मैं चुप सा मद्धम सा कल का आसमान बनाता
अनचाहे कतरों को निकाल – बस अच्छे महकते अनुभवों से कल की यादें सजाता
इस सब में कब मेरी आँखें खुलती कैसे मैं वापस घर पहुँचता
मुझे नहीं पता चलता था – मेरी मदहोशी के ज़िम्मे मेरा बीड़ा होता था
और मुझे अपनी मदहोशी पर पूरा भरोसा था
होश में रहके कौनसे किसी ने झंडे गाड़े थे

घर पहुँच दफ्तर के कपडे-जूते संभाल
एक पल जब आईने में नज़र से नज़र मिलती
तो मैं पलकें झपका हामी भरता – कल फिर मिलेंगे
उसी जगह उसी समय – तब तक मैं ज़रा कुछ और काम संभाल के आता हूँ

फिर नयी सुबह, फिर नया दिन
चंद सिक्कों को गिन गिन
खनकते चमकते आज मेरे कल शायद तेरे
पुराने नए छोटे बड़े
सब सिक्कों को फिर गिन
एक पुराने बटुए की उधड़ी जेब में
संभाल कर मैं हर सुबह घर से निकलता

 

चंद सिक्के | Chand Sikke

 

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