घर लौटते हुए आज गर्मी बहुत थी
शाम के 7:30 बजे भी आग बरस रही थी
मैंने कार का AC बढ़ा दिया और पसीने पोंछते हुए दुनिया कोसने लगी
कितनी कारें, कितने कम पेड़, सलेटी आसमान, कोई तारा नहीं
बिन चमक का चाँद, जैसे कोई गोला बनाके उसमे रंग भरना भूल गया हो
क्यों रहते हैं हम यहाँ, खुद से बातें कर रही थी मैं
गुस्से में अपनी कार को टकराने से बचते हुए मैंने लाल बत्ती पर कार धीरे की
कार के रुकने से पहले ही एक आदमी दौड़ता हुआ साथ आके रुका
हाथ में कार चार्जर लिए हुए वो मिन्नत करने लगा
“मैडम, एक खरीद लो बस, आज कुछ नहीं बिका ”
उसकी बात ख़तम भी नहीं हुई थी की एक बच्ची भी आ गयी लाइट वाले गुब्बारे लेके
“बच्चों के लिए ले जाओ मैडम” वो बच्ची बोली
मैंने आगे देखा तो एक बूढ़ा आदमी अगरबत्ती का डब्बा लेके आया
“मैडम १० डब्बे सिर्फ १०० रूपए में ले जाओ
एक १३-१४ साल का लड़का तब तक मेरी कार का शीशा साफ़ करने लगा था
मैंने सबको मन किया और कार थोड़ी आगे बढ़ा दी की शायद ये सब पीछे हट जाएँ
हट भी गए – कोई आगे बढ़ गया, कोई उदास वहीँ खड़ा रहा
वो लड़की सड़क किनारे जाके एक पुरानी कोका कोला की बोतल से पानी पीने लगी
खुश थी – अपनी जेब से १ चॉकलेट निकाली और उसके दो हिस्से करके उसने अपने भाई को पुकारा
“ए संदीप जल्दी आके ये खाले – पिघल गयी है – देर तक चलेगी
उसके बिलकुल नज़दीक १ रिक्शा वाले ने अपनी एक चादर बिछाई और सारे कपडे उतारने लगा
सिर्फ एक छोटी निक्कर में रह गया – एक बोतल से उसने पानी के छींटे उस चादर पर मारे और वही लेट गया-
आज वो यहीं सोयेगा शायद
वहां हवा भी थी, और उसके रिक्शा के चोरी होने का दर भी नहीं था
अपनी गर्मी से परेशां पलों को मैंने याद किया और कहीं से एक मुस्कान चेहरे पर आ गयी
सोचा इन सब की ज़िन्दगी में कुछ नहीं रुकता – गर्मी सर्दी बारिश या तूफ़ान – इन्हे नींद आती है, भूख लगती है
इन्हे क्या फरक पड़ता है की खाना बासी मिल रहा है या ताज़ा,
हवा में खुशबू है या प्रदुषण,
पेड़ काट रहे हैं या पहाड़,
जानवर विलुप्त हो रहे हैं या नहीं,
बच्चे बुज़ुर्गों का ध्यान रखते हैं या नहीं
औरतों को उनका हक़ मिला है की नहीं,
दहेज़ के लिए बहु मर रही है या उसके पिता,
किसको कैसे कपडे पेहेन्ने चाहिए,
आदमी को कितना कमाना चाहिए!
दसवीं के कितने बच्चों ने आत्महत्या की,
डिप्रेशन के मरीज़ों के आंकड़े क्या हैं,
मेरा भारत महान है या तेरा पाकिस्तान
अम्बानी की बेटी की शादी ज़्यादा सुन्दर थी या बेटे की
सरकार हिन्दू के साथ है या मुस्लिम के,
अमिताभ बच्चन ने किसके बारे में क्या कहा
भारत में कामनवेल्थ गेम्स हों या ओलंपिक्स
क्या फर्क पड़ता है,
सरकार कौनसी आ रही है
प्लास्टिक से पानी पीएं या किसी का झूठा, मीठा या खरा, ठंडा या नहीं- बस पानी होना चाहिए
ये सब अमीरों के चोंचले हैं – किसी ने कहा भी तो है – खाली पेट यानि एक समस्या, भरा पेट १०० समस्या
मुझे रेहम खुद पर आ रहा था – मैंने आज ही सुबह २५ परेशानियां बताई थी अपनी किसी को
उत्तरजीविता या ‘सर्वाइवल’ उनमे से कोई भी नहीं थी



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🙂
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खूबसूरत
मेरी रचनाऔ पर भी गौर फरमाये
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Thank you. Sure. I will read your work too.
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