धरा सी धड़कती, शून्य से जनी,
हर जान संग थिरकती, मिटटी में सनी
जड़ सी जमी
मैं जड़ सी जमी
न भद्दी न सुन्दर
न रात का डर, अनन्तर हर पहर
रहूं स्थिर, या नाचती, ऊँघती या जागती
मैं पूर्ण हूँ खुद में, न थकी न थमी
मैं जड़ सी जमी
पानी देती आहार देती, बीज को पालती
नया तू, नयी तेरी दुनिया बनाती
याद रख या भुला दे, कुछ नहीं मांगती
प्राण स्रोत, जीवन दायिनी
कण-कण में रमी
मैं जड़ सी जमी
बूंदों में बरखा की कभी, अपनी प्यास बुझाती
तो कभी गहरी धरती में पहुँच के भी कुछ नहीं पाती
चुप चाप भरे हाथ
ऋतू दर ऋतू फल देती जाती – न रोती न गाती
व्रिक्षा कहते हैं मुझे, पूर्ण हूँ खुद में संपूर्ण मेरी कांति
मैं जड़ सी जमी
काट दो चाहे, आग में झुलसा दो
चीख निकलती है हर चोट पे, पर प्रकृति दर्द को कहाँ है जानती
आंसूं में व्यर्थ क्यों करूँ, जब हर जान पानी मांगती
फिर बढ़ूंगी फिर फलूंगी
जब तक मेरी जड़ है मैं नहीं मरूंगी
वृक्ष नहीं वृक्षा कहते हैं मुझे
कभी छाँव सुहावनी, कभी चिता की अग्नि बनी
मैं जड़ सी जमी
मैं धरा सी धड़कती, शून्य से जनी,
हर जान संग थिरकती, मिटटी में सनी
जड़ सी जमी
मैं जड़ सी जमी

सारांश
जीवन का विकास जड़ से है,
जब तक आप अपने मूल में जड़वत हैं,
जब तक आप अपने लक्ष्य से रूबरू हैं,
कोई दर्द, कोई अड़चन आपकी नींव नहीं हिला सकती।
यहाँ वृक्ष को औरत की तरह देखा गया है,
और औरत को वृक्ष की तरह।
यह कहानी जितनी एक जड़वत वृक्ष की है,
उतनी ही एक माँ की है, एक रक्षक की है, एक प्रशिक्षक की है।
उत्कृष्ठ रचना।
LikeLiked by 1 person