मैं लिखने बैठती हूँ जब भी
पुरानी एक डायरी है जो दिखती है सबसे ऊपर
हर बार एक एक पन्ना पलट कर आखरी खाली वाले तक जाती हूँ
हमेशा पुराने में से ही नए शब्द खोजती हूँ, यूँ होती है हर शाम बसर
कुछ ऐसा लिखा था नाम तेरा पहले पन्ने पर,
पीछे की जिल्द पर भी धुंधला सा दिख जाता है अक्सर!
मैं फिर अक्षर बटोरने बैठती हूँ,
एक एक कर पुरानी यादों को निकाल कलम में कुछ नया पिरोती हूँ!
मैं कुछ नया लिख के सुनाने लगती हूँ,
ज़हन से निकल आता है कुछ पुराना ही मगर
इस ढूंढ़ने पिरोने में फिर हर बात आकर रूकती है तुझपर
तुम तो खैर – तब भी नहीं थे अब भी नहीं हो मुझे मयस्सर!

Excellent. Naren said it, there was something missing in the original. Now it is complete and makes it beautiful.
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Thank you papa
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