क्या खूबसूरत समाँ है
बेहद ठंड और धुआँ है
ना धूप है निकली
ना सेक, ना रौशन जहाँ है
ना वो अपना सा आलस
ना मेरे पास आता वो मीठे पानी का कुआँ है
ना परिचित रास्ता, ना ठहाके
ना ही पुकारता फ़लाँ फ़लाँ है
ना साख गिरने का डर, ना जवाबदेही
ना ऊँघता हुआ एक भी रुआँ है
लेटे हुए एकटक पंखे को घूरने का मौक़ा
कहाँ बार बार मिला है
न्यूनतम तापमान और अल्पतम स्तर
में ही सिर्फ़ अधिकतम की आशा है
शून्य से ही सब बना है
क्या ख़ूबसूरत समाँ है
ऊपर ही ऊपर है अगला कदम
यहाँ के बाद सब रोशन
सब सवेरा सब स्पष्ट
यहाँ के बाद सब निहा है
क्या खूबसूरत समाँ है
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