मैं छलकी तू बही
मेरी तहों में तू रही
मुझ में पूरी, खुद में अधूरी,
मेरी बेखबर कस्तूरी
सिमटी, गुर्राई, महकी, मेरी दुनिया महकाई
जो किया – सब सही
कभी तमक बरसाती, कभी मेहनत
मेरी रिमझिम, बड़ी हठी
थिरकती
खनकती
बिलखती फिर चेहेकती
मेरी आँखें, मेरे शब्द
मेरी सांझ, मेरी सखी
मोह से, ताप से, और मोह के ताप से
मैं पिघली, तू जली
मेरी तहों में तू रही
इस साधारण दुनिया में असाधारण सी
बंद दरवाज़ों में खुली अलमारी सी
पुरानी जर्जर किताबों में अमिट स्याही
जीवन बूँद बूँद कर रिसा, तू नदी सी बही
मेरे सुबहों में उठी, रतजगे में जगी
आदर्श को तलाशती
हर ज़र्रा तराशती
ढूंढ़ती पूर्ण प्रेम को
बेधड़क थी तू चली
मुझसे तू नहीं, तुझसे मैं हूँ
मेरी भोली,
डर में सिमट मत, पूर्णता में नाच
तू जहाँ भी जाए, जब भी बढे, जहाँ भी रुके,
पीछे मुड़ना – देखना मैं खड़ी

Perhaps one of your best poem in recent times. A wonderful tribute to your li’l sis described quite precisely. My bountiful praise.
Love you always!
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Wow! It’s lovely 👏
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