दिन अधूरा, रात बेज़ार
सब अलग होता – हाँ कहते जो तुम, न करते इंकार
क्या तुमने मुढ़ के देखा था?
या चले गए थे तुम नयी राहों की चाह में?
क्या कोई खत लिख के छोढ़ा था?
या सिर्फ आगे के मंसूबों में लगे थे सामान समेटते हुए?
तुमने अपनी नींव को सहेजा?
या आने वाले कल पे बीते हुए पल को भुला दिया?
सवाल हैं कुछ, कचोटते हैं- कुरेदते हैं
दिन अधूरा, रात बेज़ार
सब अलग होता – हाँ कहते जो तुम, न करते इंकार
सुन तो सकते हो तुम मुझे, बिन कहे, बिन सुने जानते हो मेरी तड़प को
मुंह मत फेरो, वापस भी नहीं बुलाओ चाहे
बस इतना बता दो जब मैं थी वहां, तुम कहाँ थे?
वहां न होने का दर्द था तुम्हें?
या याद भी नहीं कहाँ मिलने का वादा था?
तुम्हारा आने वाला कल मुबारक तुम्हें
मुझे बीते कल में तो रहने दो
कह दो हाँ – तुमने पुकारा था
कोशिश की थी, चिट्ठी भेजी थी, तस्वीर लेकर ढूंढा था मुझे
कहो बीता कल खूबसूरत था
कह दो ना-
मेरे दिन हैं अधूरे रातें बेज़ार
सब अलग होता – हाँ कहते जो तुम, न करते इंकार
तेरा कल आगया, मेरा कल अभी गुज़रा ही नहीं
मैं उसी लम्हे को जीती हूँ बार बार
क्या प्यार? किसकी पुकार? क्या बरकरार?
सब बेकार!
मेरे दिन हैं अधूरे रातें बेज़ार
क्या अलग होता कुछ – हाँ कहते जो तुम, न करते इंकार?

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