जीवन तराशते, प्रकाश तलाशते
मेरा जीवन बनाते
कल से बेहतर आज,
आज से बेहतर कल
मेरे पिता के हाथ
कभी करुणा से आखों की नमी पोंछते
कभी झूठी नाराज़गी जताके लगाम खींचते
बेरोक प्रेरक शक्ति बन कुछ लिखते जाते
कभी खर्चे का हिसाब, कभी कल के ख्वाब
मेरे पिता के हाथ
द्रढ़ थे हर कदम,
गोद में उठाने में
चलना सिखाने में
नर्म हो जाते थे लेकिन बुखार में मेरे सर पे पट्टी रखते हुए
प्यार से पुचकारते थे गणित में फेल होने पर
मेरे पिता के हाथ
डरे थे उस दिन – मेरी पसंद मैंने उन्हें बताई थी जब
समाज को कैसे समझायेंगे सोच कर ढीले भी पड़े होंगे शायद
फिर वही हाथ लढ़े भी थे अपने परिवार से
मेरी बेटी अपनी मर्ज़ी की ज़िन्दगी जीएगी – ऐसा कह दिया था उन्होंने हठी होक एक दिन
कांपे थे उस रात – मेरा ब्याह हुआ था जिस दिन
कन्यादान करते हुए डरे भी थे
मेरा हाथ थमाते हुए मेरे जीवनसाथी के हाथ में
संकोच भी हुआ था उन्हें
पर मेरी ख़ुशी को अपनी ख़ुशी से ऊपर रखा है उन्होंने
हमेशा सर उठा के जीना ऐसा कहा है उन्होंने
मेरे पिता के हाथ
मेरे लिए खुले रहते हैं हमेशा
मैं जितना भी मांग लूँ वो बस देना जानते हैं
दिन प्रतिदिन अपना सीना सहलाते
मेरी तरक्की पर खुद पे इतराते
मेरे पिता के हाथ
भोले ईमानदार आगे बढ़ने को हमेशा तैयार
निडर, अडिग, पढ़ाते हुए शजर का पाठ
बनाओ अपना
कल से बेहतर आज,
आज से बेहतर कल
मेरे पिता के हाथ

Image Credits: Henry Moore – ‘The Artist’s Hands I’ (charcoal, wax crayon and ballpoint pen)
Leave a comment