अब हुई है शाम
क्या हम थे वहां या सिर्फ सपना ही था,
कुछ पर्दे थे, कुछ हुआ खुले आम।
क्या तेरी कही क्या मेरी सुनी,
शब्द ही तो थे, हुई अपनी ही ज़ुबाँ बेईमान।
सब बिखर गया – अब हुई है शाम।
अब मद्धम सी रोशनी है और बस एक आगे बढ़ती घड़ी
मैने कहा इससे रुकने को, वापस मुड़ने को,
कुछ यादें हैं पीछे कुछ टूटी , कुछ जुड़ी,
समेटनी हैं, बटोरनी हैं
कुछ किताबें भी हैं डब्बे में बंद ज़मीन में गड़ी।
वो बोली ये ही नहीं सकता, तुम अगली बार कोशिश करना
ठीक से चलना, सब संभाल के रखना।
कुछ भी कह लूँ- ये वक़्त चलता रहा बेलगाम
सब पीछे छूट गया, अब हो गई है शाम।
मेरी नींद टूटी हुई अब, जब सब सुस्त है, थका है कमजोर है, सूखी आंखें, नीले होंठ, सर्दी में थमती धड़कन, सब टूट चुका है
ना गर्म चाय का प्याला, ना साथ पीने वाला,
अब हुई है शाम।
हमेशा गलत नहीं थे हम- बहुत झगड़े जीते- दूसरे को झुकाया सब हासिल किया, उसे पीछे छोड़ आये जिसके बिना ये सब था मात्र कतरे समान।
अब हुई है शाम।
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