तुम कहते हो प्यार क्या है मैं नहीं समझतीशायद नहीं समझतीतुम जो कहते हो सही ही कहते होबस तुम्हारे पीछे पीछे चलती हूँतुम हँसते हो तो हंसती हूँजब रोते हो तो रो देती हूँतुम्हारी परछाई जैसीतुम तक पहुँचने की कोशिश करतीजैसे तैसे बस तुम्हारे दाएं बाएं इधर उधर मंडराती रहतीपर शायद प्यार मैं नहीं समझतीसही... Continue Reading →
कुछ अपना सा
कभी सोचा है वहाँ क्या है?वहाँ उस मोड़ परवो जो एक पेड़ों में ढका मकान हैहाँ वहीं जहां कभी नज़र नहीं रुकीकभी बस नहीं रुकी, कभी टैक्सी नहीं मिलीवहीं जहां से कभी कोई नहीं आता जाता दिखाअंदर कोई तो होगा मगरआज ठीक उसके सामने एक coffee shop में बैठी हूँकिसी का इंतेज़ार कर रही हूँ... Continue Reading →
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