कुछ दरवाज़े अंदर की ओर खुलते हैं उन्हें हाथ से अपनी तरफ खींचना पड़ता है खुद हट के उन्हें रास्ता देना पड़ता है आराम से निकलना पड़ता है नहीं तो गिरने का डर लगता है ये बाहर की दुनिया के लिए अंदर आने का न्यौता हैं पर अंदर वालों के लिए जैसे पिता की चौखट... Continue Reading →
मेरी रिमझिम
मैं छलकी तू बही मेरी तहों में तू रही मुझ में पूरी, खुद में अधूरी, मेरी बेखबर कस्तूरी सिमटी, गुर्राई, महकी, मेरी दुनिया महकाई जो किया - सब सही कभी तमक बरसाती, कभी मेहनत मेरी रिमझिम, बड़ी हठी थिरकती खनकती बिलखती फिर चेहेकती मेरी आँखें, मेरे शब्द मेरी सांझ, मेरी सखी मोह से, ताप से,... Continue Reading →
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