मैं लिखने बैठती हूँ जब भी पुरानी एक डायरी है जो दिखती है सबसे ऊपर हर बार एक एक पन्ना पलट कर आखरी खाली वाले तक जाती हूँ हमेशा पुराने में से ही नए शब्द खोजती हूँ, यूँ होती है हर शाम बसर कुछ ऐसा लिखा था नाम तेरा पहले पन्ने पर, पीछे की जिल्द... Continue Reading →
हाँ कहते जो तुम…
तेरा कल आगया, मेरा कल अभी गुज़रा ही नहीं मैं उसी लम्हे को जीती हूँ बार बार क्या प्यार? किसकी पुकार? क्या बरकरार? सब बेकार! मेरे दिन हैं अधूरे रातें बेज़ार क्या अलग होता कुछ - हाँ कहते जो तुम, न करते इंकार?
मेरे पिता के हाथ
जीवन तराशते, प्रकाश तलाशते मेरा जीवन बनाते कल से बेहतर आज, आज से बेहतर कल मेरे पिता के हाथ कभी करुणा से आखों की नमी पोंछते कभी झूठी नाराज़गी जताके लगाम खींचते बेरोक प्रेरक शक्ति बन कुछ लिखते जाते कभी खर्चे का हिसाब, कभी कल के ख्वाब मेरे पिता के हाथ द्रढ़ थे हर कदम,... Continue Reading →
तुम्हारे हिस्से की मेरी कहानी
तुम देखना सपने नए मैं सहेजूँगी यादें पुरानी तुम उड़ के देखो उड़ान कहाँ तक मैं देखूंगी गहराई कितनी तुम समेटना भीतर सब कुछ मैं संभाल लुंगी बाहर की कहानी तुम बांचना सफर के पड़ाव मैं बताती रहूंगी राहें कमानी ज़िन्दगी थोड़ी तुम जीना बाकी मैं पी लुंगी थोड़ी तुम गुनगुनाना बाकी मैं गा लुंगी... Continue Reading →
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